यह रचना सम्पादकीय पृष्ठ पर 4 मार्च 2011 को एक साथ 13 राज्यों और 53 संस्करणों में एक साथ प्रकाशित हुआ है ...
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Monday, March 14, 2011
यह रचना सम्पादकीय पृष्ठ पर 4 मार्च 2011 को एक साथ 13 राज्यों और 53 संस्करणों में एक साथ प्रकाशित हुआ है ...
Thursday, February 10, 2011
Thursday, January 13, 2011
ऐतिहासिक चश्में में बुरहानपुर के वो दिन ....
वाकया अक्तूबर महीने का है . शाम के ४ बजे होंगे . ठण्ड का अहसास होने लगा था . पुलिस मुख्यालय से लेटर आ चुका था . अगले दिन बुरहान पुर के पुलिसवालों पर एक सर्वे के लिए निकलना था । तीन लोगों की टीम थी। इस टीम में साथ होना हमारे लिए कोई नया अनुभव नहीं था . वैसे भी हम अधिकतर साथ ही रहा करते थे । नया था तो बुरहानपुर जिसे हम तीनों किताबों में पढ़ चुके थे । ढ़ेर सारी बातें थी इस शहर की जो रोमांचित कर रही थी । ये भी इत्तेफाक था के हम तीनों प्राचीन इतिहास के छात्र रह चुके थे । प्राचीन अवशेषों से बहुत लगाव था । जैसे- तैसे रात कटी और अगले दिन पैकिंग हो गयी । कुशीनगर एक्सप्रेस से बुरहानपुर पहुंचे। स्टेशन से शहर में प्रवेश और प्रवेश द्वार के दर्शन । ये इतवार गेट था .....

शुरू हो गयी ऐतिहासिक यात्रा , जिसमें प्राचीन इतिहास के ब्रघ्नपुर को मध्यकालीन इतिहास के इमारतों में तब्दील हुए देख रहे थे । अब ठहरने का बंदोबस्त करना था । टीम के एक साथी को इस शहर का दूसरा अनुभव था । इसलिए हम दोनों उनके कहे अनुसार होटल कृष्ण में गए । जल्द ही एक रूम बुक करके हम लोग लजीज भोजन की तलाश में निकल गए । जल्द ही होटल हकीम पहुंचे जहाँ शाकाहारी और मांसाहारी दोनों की व्यवस्था एक ही मेज पर थी । खाना खाने के बाद हम लोग थके थे इसलिए जल्द ही सो गए । ........
तड़के सुबह तैयार होकर निकल पड़े तत्कालीन एसपी से मिलने । मध्य प्रदेश पुलिस के ऊपर एड्स की जागरूकता के सम्बन्ध में एक सर्वे करना था जिसमें हमें बुरहानपुर पुलिस पर इस अध्ययन का कार्यभार सौंपा गया था । एसपी ने टीआई को हमारी सुविधा के लिए दिशा निर्देश दे दिया । पहले दिन सर्वे का काम पूरा करके हम शहर में घूमने लगे । होटल से निकलते ही जामा मस्जिद के पिछले हिस्से में पहुँच गए ।
ये नगर के बीचोबीच स्थित था । साढ़े 36 मीटर लम्बी मीनारों को 1588-89 फारुखी शासक राजा अली खान ने बनवाया था । तब से लेकर अब तक काले पत्थरों से बने इस मस्जिद ने बुरहानपुर के अनेक रंग देखे ।अक्तूबर 2008 में हुए कम्युनल राइट में पूरा शहर दंगे में झुलस रहा था ....
मस्जिद के पीछे दंगे का एक दृश्य ......कुछ भी हो आज ये गलियां गुलजार थीं । दूर दूर तक दंगे का कोई नामोनिशान नहीं था । शाम करीब ६ बजे का वक्त होगा । मस्जिद पर नजर पड़ते ही उसमें प्रवेश कर उसे देखने की तीव्र इच्छा हुई ।......

लगभग ८ मीटर ऊँचा और ३ मीटर चौड़े प्रवेश द्वार से हम अन्दर गए । शहर के बीच शहर के कोलाहल से दूर बेहद शांत, नीरव ... चाहरदीवारी से घिरा बरामदा दिव्य सभागृह जैसा था । इबादत खाना लगभग ४८ मीटर लम्बा और१६ मीटर चौड़ा था । छज्जे पर पुष्प और पंखुड़ियों की बेहतरीन नक्काशी थी ....

कुछ देर हम वहीँ बैठे रहे । मस्जिदके निर्माण कल से सम्बंधित बातें होती रहीं .......
बातो - बातों में समय का पता ही नहीं चला । मस्जिद के किवाड़ बंद होने का समय हो गया । जाने से पहले मौलवी सेमुलाकात की । बेहद नम्र अंदाज में उन्होंने जानकारियां दी । ....
हम बहार आ गए । जैसा की किसी शहर का परिचय उसके खान -पान से भी होता है । बुरहान की जलेबी का नामबहुत सुना था तो खींच ले गयी जलेबी हमें बीच बाजार में । खाया और ........ क्या ? स्वाद की अभिव्यक्ति शब्दों में भला ये मुमकिन नहीं है । ये तौहीन होगी । ..... ???
... जारी
Saturday, December 11, 2010

दिन बीत जातें हैं यादों को याद करने में
चरों तरफ सिर दिखाई दे रहें हैं , चुनौतियाँ बहुत हैं . लोग एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं ..कोई अपने रास्ते पर अपनी गति से चला जा रहा है तो कोई शार्ट कट अपना रहा है .....कोई आगे निकलने के लिए लोगों को पीछे धकेल रहा है तो किसी को इस बात की चिंता है कि साथ चलने वाले आगे न हो जाएँ ...इन सबके पीछे छूट गया है ....बहुत कुछ ....इस रेस के धावकों के लिए एक यक्ष प्रश्न है जो लगातार पीछा करता रहता है ....जीवन के अन्तिम पड़ाव पर जाकर प्रगट होता है ...??? अगर बचपन में ही रेस में दौड़ा दिया जाये ,, ये सोचकर कि पहले कुछ हासिल हो जाये फिर बचपन को जी लेंगे ....मुझे नहीं लगता कि बचपन के पास इतना समय है कि वो ठहर जायेगा ...यही सवाल जीवन हर पड़ाव के साथ है ...ध्यान ही नहीं देते ...इन अमूल्य चीजों को खोने के आदि हो चुकें हैं ..ये अहसास कि बातें है ...लेकिन अहसास तो मरता जा रहा है ...बेहद अमानवीय , मशीनी युग में आ गएँ है ...अब हमारे संचार साक्षात् वर्बल न होकर ,, फोन इन , वीडियो चैटिंग , फेसबुक, इ मेल टाईप मशीनी हो गए है . ये समय की मांग है ...लेकिन संवेदना विहीन होना ??? पहले करियर बना लें फिर माँ से प्यार कर लेंगे ...दोस्तों का क्या है दूसरे बना लेंगे ॥ पत्नी/ पति का क्या है ... नाम , शोहरत , पैसा रहा तो बहुत आएँगी / आयेंगे । एक दूसरे की जरूरतों से भाग रहें है ...जब सामने होतें हैं तो भावनाओं की भाषा भी बेहद किताबी होती है ॥ उसमे भी NCERT , दार्शनिकों , लेखकों की कही हुई बातों से खुद को अपने तरीके (फायदे के लिए) से समझाने और समझने की कोशिश करतें है । जब समझ में आता है तो या वह व्यक्ति कहीं दूर जा चुका होता है या फिर वो नहीं समझ पता ॥पूरी किशोरावस्था और जवानी निकल जाती है कुछ अचीव करने में ......इस दौरान बहुत कुछ पीछे छूट जाता है ॥जब बात खुशियों को बाटने की होती है तो न कोई हँसने वाला होता है न कोई रोने वाला तब सब कुछ बौना सा लगता है ....और बाकी के दिन बीत जातें हैं यादों को याद करने में ।
Saturday, December 4, 2010

रियलिटी के चक्कर में
टेलीविजन पर दिखाने की होड़ मची हुई है। मचे भी क्यों ना। दृश्य माध्यम जो ठहरा। अब क्या दिखाएं कि लोग हमें देखें यह यक्ष प्रश्र लगभग सभी चैनलों का पीछा कर रहा है। इस प्रश्र की खोज में ये बातें सामने आती हैं कि जनता ने अब तक टीवी पर वो क्या नहीं देखा। चलिए इसका जवाब आप भी ढूढि़ए और हम भी। टीवी के लोगों ने तो इसको ढूढऩे में रात दिन एक कर दिया है। बहुत सारे विचार आए भी लेकिन उसे दिखाए कौन । सभ्यता, संस्कृति आड़े आने लगी। ऊपर से सेंसर भी बैठा हुआ है। सेंसर से तो निपट लेगें। उसमें तो अपने ही लोग हैं, प्रगतिवादी सोच वाले, सभ्यता और संस्कृति को समय के साथ परिभाषित करने वाले। समस्या जनता की है। कहीं वो रिजेक्ट न कर दे। जनता को भी इस प्रगतिवादी सोच और संस्कृति के मायने को समझाना पड़ेगा। उन्हे पश्चिम की बातों से रूबरू कराना होगा। फिर उसका सहारा लेकर हम आगे बढ़ेगें। लोगों में इन बातों को देखने की आदत डालनी होगी फिर धीरे धीरे हमें उन्हें दिखाना होगा वो सब जिसे शायद वो टीवी पर, समाज में भी रहकर नहीं देख पातें हैं। सेंसर तैयार, जनता तैयार तो फिर कोर्ट करता रहे ऑर्डर-ऑर्डर। कोई फर्क नहीं पड़ता। पहले टीवी पर हम लोग, नीम का पेड़, महाभारत, रामायण सरीखे सीरियल थे। एक तरफ भीष्म की प्रतिज्ञा का सम्मान होता था वहीं दूसरी तरफ जीवन के व्यावहारिक और सैद्दांतिक पक्ष में धर्म-अधर्म की भूमिकाओं से प्रेरणा पाते थे। अनेकता के मोतियों को एकता के धागे में पिरोता हुआ सीरियल हम लोग भी लोगों में लोकप्रिय था। तब लोग शायद अनपढ़, अज्ञानी थे। अब तो पढ़े लिखों का समाज है। इस समाज ने तो परिभषाएं ही बदल डाली हैं। इस साक्षर समाज के अनुसार अगर 6 को 9 देखने में फायदा हो तो उसे 9 ही देखें। ऐसा लगता है कि पहले विकल्प भी नहीं थे। आज विकल्प है वराईटी है। एक तरफ मुन्नी जैसी ढ़ाबे वाली लडक़ी बदनाम है तो बियर बार की शीला भी काम नही है। अब तो लोगों के पारिवारिक झगड़े भी पुराने हो गए हैं। उसमें कोई ट्विस्ट नही रहा। कहीं से नए तरीकों की प्रेरणा भी नहीं मिल रही है। सास भी कभी बहु थी पुराना हो गया। लेकिन उदास होने की बात नही है। अब बिग बॉस देखिए। वराईटी से भरपूर। नए तरीकों के एक्टिवीटिज, झगड़े, प्यार , षड्यंत्र के साथ। यहां खली हैं तो डॉली भी हैं। सारा हैं तो वीना भी । पॉमेला एंडरसन को भी बुलाया गया था। ताकि लोग पश्चिमी सभ्यता के खुलेपन को देखकर ये तय करें कि वो इस मामले में कितने पीछे हैं। अगर घर की छोटी-छोटी घटनाओं को किसी से शेयर करने में शर्म आ रहा हो तो इस लिबास को ऊतार फेंकिये । भला सेलिब्रिटिज ओछी हरकतें कर सकतें हैं तो आप क्यो नहीं। अब तो इन हरकतों को ओछी कहना भी ठीक नहीं होगा। अब घरेलू समस्याओं को भी बेंचा जा सकता है। उसे आपस में सुलझाने की भी जरूरत नहीं। उसे राखी सावंत सुलझाएंगी जिन्हें इसकी विशेषज्ञता हासिल है।
हद हो गयी फिर भी लोग चुप हैं। देखे जा रहें हैं।
Tuesday, June 29, 2010

बूंदें कभी हमारी थी.......
बरसात की बूंदों में ताजगी समाई सी लगती है,
बूंदें कभी हमारी थी, मगर आज पराई सी लगती हैं .
कभी इंतजार होता था इनका अपने आँगन में
बचपन की यादों में समाई सी लगती हैं
जुदा हो गई है उन मीठे पलों के साथ ..
लगता है के अपनों से सताई सी लगती है
पहले बिजली की चमक में शरारत सी लगती थी
बादलों के घूँघट में रुलाई सी लगती है
कभी गर्जना के बीच थिरकती थी धरती पर
अब हर वक़्त विरह की शहनाई सी लगती है
मना लूँगा इन बूंदों को विश्वास है खुद पर
बरसेंगी फिर से बिजली के फलक पर
होगा यकीन इन बूंदों को हम पर .
पहले इन बूंदों में जम्हाई सी लगती थी
अब बरसात की ये बूंदें महगाई सी लगती है .....
Friday, December 18, 2009

सफल
+ लता की कहानी = सफलता , असफलता
असफल
बचपन से लेकर जवानी तक सुने हैं किस्से सफलता - असफलता के
सफल होते हैं लोग इंजिनियर डॉक्टर बनकर , दूसरो की नजरो में
लेकिन उसकी नज़रें एक सफलता के बाद बदल लेती है अपना कलेवर,
लेकिन उसकी नज़रें एक सफलता के बाद बदल लेती है अपना कलेवर,
मायने
कुछ खट्टी यादों में सफलता के घाव व डर नई सफलता की चाहत के
साथ
साथ
आखिर लता जो है दोनों के आखिरी हिस्से में जिसे मिलता है दुःख - सुख के
धूप और छाव
धूप और छाव
तब जाकर फूटती है कोपले जो बड़ी पत्ती बनकर सफल होती है या सूख कर
असफल
असफल
असफलता की सुखी पत्ती उर्जा रूपी जल में मिलकर खाद बन जाती है और सींचती है लता के
जीवन को
जीवन को
ताकि न सूखे कलियाँ
सफलता - असफलता से आगे है 'सुफलता '
अगर लता में फल आ जाये और वह उपयोगी हो तो सुफलता है
वरना करना पड़ेगा संतोष मनीप्लांट के लता की तरह
बस नाम से .........................
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